बकरी पालन से मखाना उत्पादन तक, धमतरी की छिपली दीदियों ने रचा आत्मनिर्भरता का मॉडल

रायपुर, 7 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के नगरी विकासखंड के ग्राम छिपली की महिलाओं ने सामूहिक प्रयास, नवाचार और मेहनत के दम पर ग्रामीण आजीविका की एक प्रेरक मिसाल कायम की है। स्वावलंबी महिला स्व-सहायता समूह की दीदियों ने बकरी पालन से शुरू की गई आजीविका को आगे बढ़ाते हुए मखाना उत्पादन, गाय पालन, दुग्ध व्यवसाय, मिनी राइस मिल और कैंटीन संचालन तक विस्तार दिया है। आज समूह की प्रत्येक सदस्य प्रतिमाह करीब 8 से 10 हजार रुपए की आय अर्जित कर रही है।
बकरी पालन से रखी आत्मनिर्भरता की नींव
समूह की अध्यक्ष श्रीमती दुर्गेश नंदनी साहू के अनुसार, शुरुआती दौर में महिलाओं को एकजुट करना और सामूहिक रूप से काम करने के लिए तैयार करना सबसे बड़ी चुनौती थी। आपसी विश्वास और समन्वय के साथ महिलाओं ने पशुपालन विभाग के मार्गदर्शन में बकरी पालन को अपनी आजीविका का आधार बनाया।
शुरुआती दिनों में बाजार के उतार-चढ़ाव और आर्थिक नुकसान का भी सामना करना पड़ा, लेकिन समूह की महिलाओं ने इसे चुनौती मानकर पशु स्वास्थ्य, प्रबंधन और बाजार की जरूरतों को समझा। लगातार मेहनत और बेहतर प्रबंधन से बकरी पालन उनके लिए आय का स्थायी माध्यम बन गया।
एक काम से कई आय के स्रोत किए तैयार
बकरी पालन में सफलता मिलने के बाद समूह की महिलाओं ने अपनी गतिविधियों का दायरा लगातार बढ़ाया। गांव के तालाब में मखाना उत्पादन शुरू किया गया। इसके साथ गाय और बकरी पालन को बढ़ावा देकर दुग्ध व्यवसाय को भी आजीविका से जोड़ा गया।
मखाना उत्पादन से निकलने वाले छिलके और जैविक अवशेषों का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में किए जाने से चारे की लागत कम करने में भी मदद मिलती है। इस तरह एक गतिविधि से निकलने वाले संसाधन को दूसरी गतिविधि में उपयोग कर समूह ने बहुआयामी आजीविका मॉडल तैयार किया है।
महिलाओं ने दलहन-तिलहन फसलों के साथ फलदार पौधों की वैज्ञानिक खेती भी अपनाई। वहीं, गांव में मिनी राइस मिल और कैंटीन का संचालन शुरू कर दैनिक आय के नए रास्ते तैयार किए गए।
हर सदस्य की आय 8 से 10 हजार रुपए प्रतिमाह
समूह की विभिन्न गतिविधियों के विस्तार का सीधा असर महिलाओं की आमदनी पर पड़ा है। आज समूह की प्रत्येक सदस्य करीब 8 से 10 हजार रुपए प्रतिमाह की आय अर्जित कर रही है। इससे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और महिलाओं में आर्थिक निर्णय लेने का आत्मविश्वास भी बढ़ा है।
छिपली की महिलाओं का यह मॉडल इस बात का उदाहरण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध स्थानीय संसाधनों, सामूहिक प्रयास और उचित मार्गदर्शन के जरिए एक ही गांव में रोजगार और आय के कई अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
प्रशासन और विभागीय सहयोग बना ताकत
महिलाओं की इस यात्रा में जिला प्रशासन और पशुपालन विभाग का तकनीकी सहयोग महत्वपूर्ण रहा। प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और आजीविका गतिविधियों के विस्तार में विभागीय सहयोग से समूह को नई दिशा मिली।
जिला प्रशासन का मानना है कि स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का प्रभावी माध्यम है। छिपली की महिलाओं ने साबित किया है कि सही अवसर, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन मिलने पर ग्रामीण महिलाएं अपने लिए रोजगार पैदा करने के साथ-साथ पूरे गांव की अर्थव्यवस्था को भी गति दे सकती हैं।
राष्ट्रीय मंच पर भी मिली पहचान
छिपली की महिलाओं की सफलता केवल गांव और जिले तक सीमित नहीं रही। समूह के इस अनुकरणीय आजीविका मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना और सम्मान मिल चुका है। पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के हाथों सम्मानित होना समूह की महिलाओं के संघर्ष, सामूहिक प्रयास और उपलब्धियों की महत्वपूर्ण पहचान है।
सामूहिकता और नवाचार से बदली तस्वीर
छिपली गांव की कहानी बताती है कि ग्रामीण महिलाओं के पास यदि सामूहिक इच्छाशक्ति, स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग और सही मार्गदर्शन हो, तो वे आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख सकती हैं। बकरी पालन से शुरू हुआ सफर आज मखाना उत्पादन, दुग्ध व्यवसाय, खेती, मिनी राइस मिल और कैंटीन संचालन तक पहुंच चुका है।




