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पॉक्सो के बढ़ते मामलों के बीच बड़ा सवाल: क्या सिर्फ कानून से सुरक्षित होगा बचपन?

रायपुर। देश में पॉक्सो (Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012) के तहत दर्ज मामलों में लगातार बढ़ोतरी चिंता का विषय है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इसका कारण केवल अपराधों में वृद्धि नहीं, बल्कि समाज में बढ़ती जागरूकता भी है, जिसके चलते पहले छिपाए जाने वाले मामले अब सामने आने लगे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों की सुरक्षा केवल कठोर कानूनों से सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके लिए परिवार, विद्यालय, समाज, पुलिस, न्यायपालिका और मीडिया सभी की साझा जिम्मेदारी है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(3), 21, 21ए, 39(e), 39(f), 45 और 51A(k) बच्चों की गरिमा, सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार को मजबूत आधार प्रदान करते हैं। वहीं भारत संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC) का भी पक्षकार है, जो प्रत्येक बच्चे के सर्वोत्तम हित और यौन शोषण से सुरक्षा की गारंटी देता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न मामलों में स्पष्ट किया है कि पॉक्सो कानून का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि पीड़ित बच्चों को संवेदनशील और पीड़ित-अनुकूल न्याय व्यवस्था उपलब्ध कराना है। अदालतों ने त्वरित जांच, विशेष न्यायालयों की प्रभावी कार्यप्रणाली और बच्चों की गोपनीयता बनाए रखने पर विशेष जोर दिया है।

डिजिटल दुनिया बनी नई चुनौती

आज स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग के बढ़ते प्रभाव के बीच साइबर ग्रूमिंग, फर्जी पहचान, ऑनलाइन ब्लैकमेल और डिजिटल शोषण जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल सुरक्षा को भी बाल संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाना चाहिए।

विद्यालयों और महाविद्यालयों में जीवन कौशल, लैंगिक संवेदनशीलता, साइबर सुरक्षा और कानूनी जागरूकता पर नियमित प्रशिक्षण समय की आवश्यकता है, ताकि बच्चे किसी भी अनुचित व्यवहार की पहचान कर समय रहते शिकायत कर सकें।

परिवार और समाज की भूमिका सबसे अहम

विशेषज्ञों के अनुसार माता-पिता यदि बच्चों के साथ खुलकर संवाद करें और विश्वास का माहौल बनाएं तो कई संभावित अपराध शुरुआती स्तर पर ही रोके जा सकते हैं। वहीं समाज को भी यह समझना होगा कि बच्चों की सुरक्षा केवल सरकार या पुलिस का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।

जन-जागरूकता अभियान, कानूनी साक्षरता, साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण और विद्यालय आधारित बाल संरक्षण तंत्र को मजबूत बनाकर ही बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार किया जा सकता है।

निष्कर्ष

विशेषज्ञों का मानना है कि पॉक्सो कानून की सफलता केवल दर्ज मामलों या दोषसिद्धि की दर से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि देश अपने बच्चों को कितना सुरक्षित, सम्मानजनक और भयमुक्त वातावरण उपलब्ध करा पाता है। कानून आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी एक जागरूक, संवेदनशील और उत्तरदायी समाज है।

लेखक: अधिवक्ता डी.पी. जोशी, रायपुर (छत्तीसगढ़)

मो.: 9893354327

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