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छत्तीसगढ़ में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती, पशुपालन और मत्स्य पालन से खुल रहे आय के रास्ते

रायपुर, 10 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में पशुपालन, डेयरी व्यवसाय और मछली पालन ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ स्वरोजगार के नए अवसर पैदा कर रहे हैं। खेती के साथ आजीविका के दूसरे साधन अपनाकर किसान अपनी आय बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। शासकीय योजनाओं, अनुदान और विभागीय मार्गदर्शन से ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनने में मदद मिल रही है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य शासन द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए पशुपालन, डेयरी व्यवसाय तथा मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। सरगुजा जिले के संध्या, अनिल कुमार खेस, बाबूनाथ और सनी लाल की कहानियां इस बदलाव की मिसाल पेश करती हैं।

डेयरी व्यवसाय से संध्या को हर महीने 15 हजार रुपये की बचत

सरगुजा जिले के ग्राम लमगांव की निवासी संध्या ने राज्य डेयरी उद्यमिता विकास योजना के तहत वर्ष 2024 में मिले अनुदान की मदद से अपने डेयरी व्यवसाय को आगे बढ़ाया। आज उनकी डेयरी से प्रतिदिन लगभग 30 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। दूध की बिक्री से उन्हें रोजाना करीब 1,200 रुपये की आय होती है।

पशुओं के चारे, पानी और अन्य खर्चों को घटाने के बाद संध्या हर महीने लगभग 15 हजार रुपये की बचत कर रही हैं। इससे उनकी सालाना बचत करीब एक लाख से डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच रही है। वह अपनी डेयरी को भविष्य में और बेहतर बनाने की दिशा में भी काम कर रही हैं। उनके पास मौजूद तीन बछियों को भविष्य में प्रजनन के लिए तैयार किया जा रहा है, जिससे पशुधन और दूध उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है।

दो कमरों से शुरू किया सूकर पालन, अनिल ने चुना स्वरोजगार का रास्ता

ग्राम शिवनाथपुर निवासी अनिल कुमार खेस ने वर्ष 2018 में पशुधन विकास विभाग की सूकर प्रदाय योजना के तहत मिली सहायता से सूकर पालन शुरू किया था। उन्होंने सीमित संसाधनों के बीच महज दो कमरों से इस व्यवसाय की शुरुआत की।

मेहनत, पशुओं की नियमित देखभाल और विभागीय मार्गदर्शन के सहारे उन्होंने सूकर पालन को अपनी आजीविका का महत्वपूर्ण साधन बनाया। उनकी कहानी बताती है कि सही जानकारी, उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग और लगातार प्रयास से छोटे स्तर पर भी स्वरोजगार की शुरुआत की जा सकती है।

आजीविका डबरी से सिंचाई और मछली पालन को मिला बढ़ावा

अम्बिकापुर विकासखंड के ग्राम सकालो निवासी किसान बाबूनाथ के लिए आजीविका डबरी का गहरीकरण और मरम्मत खेती-किसानी में मददगार साबित हुआ है। ग्रामीण रोजगार योजना के तहत डबरी की जल संग्रहण क्षमता बढ़ने से अब उन्हें खेतों की सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो रहा है।

इस सुविधा से साग-सब्जियों की खेती करना आसान हुआ है। बाबूनाथ ने डबरी में मछली बीज भी डाला है, जिससे उन्हें मत्स्य पालन के जरिए अतिरिक्त आमदनी की संभावना मिली है। इस तरह एक ही जल संसाधन का उपयोग सिंचाई और मछली पालन, दोनों के लिए किया जा रहा है।

खाली जमीन पर सब्जी उत्पादन और मछली पालन कर रहे सनी लाल

आजीविका डबरी ने किसान सनी लाल के लिए भी आजीविका के नए अवसर खोले हैं। पहले उनकी जमीन का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा था, लेकिन डबरी बनने के बाद वर्षा जल संग्रहण की सुविधा विकसित हुई।

अब वह डबरी में मछली पालन करने के साथ आसपास की जमीन पर साग-सब्जियों की खेती कर रहे हैं। सब्जी उत्पादन से घरेलू जरूरतें पूरी करने में मदद मिल रही है, जबकि मछलियों के तैयार होने पर उन्हें बाजार में बेचकर अतिरिक्त आय अर्जित करने की उम्मीद है।

सरकारी योजनाओं से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रही मजबूती

राज्य डेयरी उद्यमिता विकास योजना, पशुधन विकास विभाग की सूकर प्रदाय योजना और ग्रामीण रोजगार योजना के अंतर्गत आजीविका डबरी निर्माण एवं गहरीकरण जैसे कार्य ग्रामीण परिवारों के लिए उपयोगी साबित हो रहे हैं।

डेयरी व्यवसाय से नियमित आमदनी, सूकर पालन से स्वरोजगार और डबरी आधारित खेती तथा मछली पालन से अतिरिक्त आय के अवसर विकसित हो रहे हैं। इससे किसानों को पारंपरिक खेती के साथ दूसरे व्यवसाय अपनाने का अवसर मिल रहा है।

सरगुजा के इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि शासकीय सहायता, तकनीकी मार्गदर्शन और ग्रामीणों की मेहनत मिलकर आत्मनिर्भरता की राह आसान बना सकते हैं। जल संरक्षण और पशुधन आधारित आजीविका को बढ़ावा देकर ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने तथा गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं।

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