Vishwakarma Jayanti 2026: आज मनाई जा रही विश्वकर्मा पूजा, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

रायपुर। हर साल कन्या संक्रांति के अवसर पर भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है। इस वर्ष विश्वकर्मा जयंती 17 सितंबर 2026, गुरुवार को मनाई जा रही है। भगवान विश्वकर्मा को धार्मिक मान्यता में सृष्टि के दिव्य शिल्पकार और निर्माण कला का देवता माना जाता है। यही वजह है कि विश्वकर्मा पूजा का दिन कारीगरों, इंजीनियरों, श्रमिकों, व्यापारियों और निर्माण कार्य से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है।
विश्वकर्मा जयंती पर कारखानों, वर्कशॉप, दुकानों, कार्यालयों और निर्माण स्थलों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान काम में इस्तेमाल होने वाले औजार, मशीन, कंप्यूटर, वाहन और अन्य उपकरणों की भी पूजा की जाती है।
विश्वकर्मा जयंती 2026 का शुभ मुहूर्त
17 सितंबर को कन्या संक्रांति का क्षण सुबह 7:58 बजे बताया गया है। इसी समय से विशेष पुण्य काल शुरू होगा। पूजा के लिए दिन में कई शुभ समय बताए गए हैं।
- कन्या संक्रांति: सुबह 7:58 बजे
- विशेष पुण्य काल: सुबह 7:58 बजे से 10:01 बजे तक
- पूजा का मुख्य समय: सुबह 7:58 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक
- अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:51 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक
- चल चौघड़िया/लाभ मुहूर्त: सुबह 10:43 बजे से दोपहर 1:48 बजे तक
इन शुभ समयों में भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जा सकती है।
कैसे करें भगवान विश्वकर्मा की पूजा?
विश्वकर्मा पूजा के लिए सबसे पहले पूजा स्थल और कार्यस्थल की अच्छी तरह सफाई करें। इसके बाद चौकी पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। पूजा स्थल पर कलश स्थापित करके उसके ऊपर नारियल रखें।
इसके बाद भगवान का प्रतीकात्मक अभिषेक जल या पंचामृत से करें। रोली या कुमकुम से तिलक लगाएं और अक्षत, फूल व माला अर्पित करें। धूप और दीप जलाकर भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करें।
पूजा के दौरान फल, मिठाई और अन्य सात्विक भोग अर्पित करें। मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विश्वकर्मा से कार्य में सफलता, सुख-समृद्धि और कार्यस्थल पर सुरक्षा की प्रार्थना की जाती है।
विश्वकर्मा पूजा की सामग्री
विश्वकर्मा पूजा के लिए सामान्य पूजा सामग्री का इस्तेमाल किया जा सकता है। पूजा की प्रमुख सामग्री में शामिल हैं—
- रोली और कुमकुम
- अक्षत
- ताजे फूल और फूलों की माला
- धूप और दीप
- फल और मिठाई
- पंचामृत
- सुपारी और पान के पत्ते
- कलश और नारियल
- मौली
पंचामृत बनाने के लिए दूध, दही, घी, शक्कर और शहद का इस्तेमाल किया जाता है। भोग में मौसम के अनुसार केले, सेब, संतरे सहित अन्य ताजे फल भी रखे जा सकते हैं।
भगवान विश्वकर्मा को कौन-सा भोग लगाएं?
विश्वकर्मा पूजा में भगवान को पंचामृत अर्पित करने की परंपरा है। इसके अलावा कई स्थानों पर मूंग दाल की खिचड़ी का सात्विक भोग भी लगाया जाता है।
इसके साथ बेसन के लड्डू, बूंदी, पेड़ा, बर्फी जैसी मिठाइयां और मौसमी फल भी भोग में रखे जा सकते हैं। पूजा और आरती के बाद प्रसाद को परिवार के सदस्यों तथा कार्यस्थल पर मौजूद लोगों में बांटा जाता है।
औजार, मशीन और वाहनों की भी होती है पूजा
विश्वकर्मा पूजा की सबसे खास परंपराओं में से एक है कार्य में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की पूजा। इस दिन कारखानों, दुकानों, वर्कशॉप और कार्यालयों में मशीनों, कंप्यूटर, औजारों, वाहनों और अन्य उपकरणों की सफाई की जाती है।
इसके बाद इन पर रोली, हल्दी, अक्षत और फूल चढ़ाकर पूजा की जाती है। हालांकि मशीनों और वाहनों की पूजा करते समय सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। चलती मशीन को छूने या उसके आसपास असावधानी से पूजा करने से बचना चाहिए।
विश्वकर्मा भगवान की आरती
पूजा के अंत में भगवान विश्वकर्मा की आरती की जाती है। आरती के दौरान श्रद्धालु भगवान विश्वकर्मा से कार्य में सफलता, सुख-समृद्धि और कार्यस्थल की सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं। आरती के बाद भगवान को प्रणाम कर प्रसाद वितरित किया जाता है।
विश्वकर्मा पूजा के बाद मूर्ति विसर्जन कैसे करें?
यदि पूजा के लिए अस्थायी मूर्ति स्थापित की गई है, तो पूजा पूर्ण होने के बाद परंपरा के अनुसार उसका विसर्जन किया जा सकता है। विसर्जन से पहले भगवान की दोबारा पूजा और आरती करें। इसके बाद फूल, अक्षत और प्रसाद अर्पित कर सम्मानपूर्वक मूर्ति को विसर्जन स्थल तक ले जाएं।
मूर्ति विसर्जन के दौरान स्थानीय प्रशासन और पर्यावरण संबंधी नियमों का पालन करना जरूरी है। विसर्जन के लिए निर्धारित स्थान का ही इस्तेमाल करें और ऐसी सामग्री से बनी मूर्तियों या सजावटी वस्तुओं से बचें, जो जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकती हैं।
धार्मिक मान्यताओं पर आधारित जानकारी
विश्वकर्मा जयंती से जुड़ी पूजा विधि, मुहूर्त और धार्मिक मान्यताएं अलग-अलग पंचांग एवं परंपराओं के अनुसार कुछ भिन्न हो सकती हैं। इसलिए पाठक स्थानीय पंचांग या संबंधित धार्मिक विशेषज्ञ से भी जानकारी ले सकते हैं।



