झीरम घाटी फैसले पर सियासत तेज: भूपेश बघेल ने NIA जांच पर उठाए सवाल, CM साय और विजय शर्मा का पलटवार

रायपुर। झीरम घाटी नरसंहार मामले में NIA की विशेष अदालत के फैसले के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति गरमा गई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अदालत के फैसले को आधा-अधूरा बताते हुए मामले की साजिश, प्रशासनिक चूक और कथित मास्टरमाइंड की भूमिका की जांच पर सवाल उठाए हैं। वहीं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने बघेल के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा है कि यदि कांग्रेस के पास कोई ठोस सबूत हैं तो उन्हें जांच एजेंसी के सामने पेश करना चाहिए।
भूपेश बघेल बोले- असली मास्टरमाइंड कौन?
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि झीरम घाटी कांड में केवल कुछ आरोपियों को दोषी ठहराए जाने से पूरी सच्चाई सामने नहीं आती। उन्होंने सवाल उठाया कि हमले के पीछे कथित साजिश की जांच किस स्तर तक हुई और उस समय के प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी क्यों तय नहीं की गई।
बघेल ने कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री, वरिष्ठ प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों और घटना के संबंध में जानकारी रखने वाले सरेंडर नक्सलियों से पूछताछ होनी चाहिए। उनका कहना है कि इन सभी को आमने-सामने बैठाकर पूछताछ करने से घटना की कई महत्वपूर्ण परतें सामने आ सकती हैं।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि FIR में जिन नक्सली नेताओं के नाम दर्ज थे, उनमें से कुछ नाम बाद में क्यों हटाए गए। बघेल ने पूछा कि यदि हमले में बड़ी संख्या में नक्सली शामिल थे, तो केवल 10 लोगों को दोषी ठहराए जाने के बाद कथित बड़े नक्सली नेताओं की भूमिका का क्या हुआ?
प्रशासनिक चूक पर भी उठाया सवाल
भूपेश बघेल ने झीरम हमले में कथित प्रशासनिक चूक का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या NIA की जांच में उस समय तैनात पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई? क्या किसी पुलिस अधिकारी या कर्मचारी को प्रशासनिक लापरवाही के लिए दोषी ठहराया गया?
बघेल ने दावा किया कि कांग्रेस सरकार के समय गठित SIT की जांच को बाद में रोक दिया गया। उन्होंने मांग की कि षड्यंत्र के एंगल से जांच को आगे बढ़ाया जाए और जरूरत पड़ने पर तत्कालीन प्रशासनिक एवं राजनीतिक नेतृत्व से भी पूछताछ की जाए।
CM साय का पलटवार- सबूत थे तो जांच एजेंसी को क्यों नहीं दिए?
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भूपेश बघेल के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस नेताओं की ओर से पहले झीरम कांड से जुड़े सबूत होने की बात कही जाती रही है। यदि उनके पास कोई ठोस सबूत थे तो उन्हें जांच एजेंसी के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए था।
मुख्यमंत्री ने कहा कि NIA की जांच के बाद अदालत ने 100 से अधिक गवाहों की गवाही सुनकर अपना फैसला दिया है। ऐसे में अदालत के फैसले पर सवाल उठाने के बजाय कांग्रेस को फैसले का सम्मान करना चाहिए।
विजय शर्मा बोले- सबूत हैं तो NIA को सौंपें
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने भी कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि झीरम घाटी मामले में यदि किसी के पास कोई अतिरिक्त सबूत है तो उसे जांच एजेंसी को सौंपना चाहिए।
उन्होंने कहा कि 25 मई 2013 को झीरम घाटी में नक्सली हमला हुआ था और 27 मई 2013 को मामले की जांच NIA को सौंप दी गई थी। उस समय केंद्र में UPA सरकार थी। शर्मा ने कहा कि NIA की जांच और अदालत की कार्यवाही के बाद अब फैसला सामने आया है।
उन्होंने यह भी कहा कि मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और जांच से जुड़े अन्य पहलू आगे सामने आ सकते हैं।
क्या हुआ था झीरम घाटी में?
25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा का काफिला सुकमा से जगदलपुर की ओर जा रहा था। काफिले में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता शामिल थे। झीरम घाटी पहुंचने के दौरान नक्सलियों ने रास्ता रोककर काफिले पर हमला कर दिया।
हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके पुत्र दिनेश पटेल, वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा, उदय मुदलियार समेत कांग्रेस के कई नेताओं और सुरक्षा कर्मियों की मौत हुई थी। इस घटना को छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक नक्सली हमलों में से एक माना जाता है।
13 साल बाद आया अदालत का फैसला
झीरम घाटी नक्सली हमला मामले में 5 सितंबर 2026 को जगदलपुर स्थित NIA की विशेष अदालत ने फैसला सुनाया। मामले में कुल 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई हुई थी। इनमें से एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी है।
अदालत ने शेष 10 आरोपियों को मामले में दोषी ठहराया है। अभियोजन के अनुसार, आरोपियों को 27 लोगों की हत्या और 15 लोगों की हत्या के प्रयास से जुड़े आरोपों में दोषी पाया गया है। अदालत 16 सितंबर को दोषियों की सजा का ऐलान करेगी।
ये 10 आरोपी दोषी पाए गए
- प्रमिला मोडियम
- चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना
- सुमित्रा उर्फ सुमित्रा पुनेम मोडियम
- मुक्का मांडवी
- कोसा कवासी उर्फ कोसाराम
- आयता मरकाम
- मदकामी देवा
- जोगा मदकामी
- बनजामी सन्ना उर्फ चमरू उर्फ डेंगा
- महादेव नाग
झीरम घाटी मामले में अदालत के फैसले के बाद अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के साथ-साथ इस मामले की आगे की कानूनी कार्रवाई पर भी नजर रहेगी।



